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Saturday, October 20, 2012

धुप

आये हैं हमारे आंगन
रुई से चमकते बादल  
जैसे धो के अभी सुखाया हैं 
गगन भी जैसे अभी ही नहाया हैं  
अच्छी खुशबू आती मिट्टी से 
पानी की बुँदे लटकी पत्ती से  
देखो जैसे सूरज टुट गया बूंदों में 
और ये बुँदे ही फैलाती रौशनी जग में 
छोटी छोटी नदियाँ बहती 
आंगन में चांदी सी चमकती 
बारिश के बाद बतलाओ 
धुप होती हैं क्यूँ इतनी उजली 
अम्मा बाहर तो निकलो 
देखो आयी धुप बारिश में धुली  

4 comments:

Reshma said...

बारिश में धुली धूप... सुनने में जितना अच्छा लगता है, महसूस करने में उससे भी बाड़िया लगता है! Loved the way you have woven the whole scene together, I can almost picture the image

Reshma said...
This comment has been removed by the author.
Bhawna Sharma said...

dhup kitni suhavni lagti hain.bahut hi suhavni...jab apki poem padi to muje hi esa laga..

ओमी said...

धन्यवाद रेशमा और भावना :)