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Thursday, January 26, 2012

बूढी माँ

इस बार जब वो शहर से
छुट्टियों में वापस गाँव आया
रसोई में बर्तनों को बिखरा पाया
डब्बो के ढक्कन खुले पड़े थे
माँ की साफ़ रहने वाली रसोई में
तेल के कुछ दाग बिखरे पड़े थे
आधे काले आधे सफ़ेद बालो से ढके
चेहरे पे कुछ झुर्रिया भी थी
काम करते करते थक कर
माँ अक्सर बैठ भी जाती थी
लेकिन सुनकर उसकी फरमाईश
आँखों में चमक पहले सी थी
निकल पड़ी अपना वही पुराना
झोला लेकर सामान खरीदने
इतने दिनों बाद आया है बेटा
उसके लिए गाज़र का हलवा बनाने
लेकिन जब गाजर के हलवे में 
नमक पड़ गया
और स्वाद से वो
नमकीन हो गया 
तब भी रखा उसने याद
हलवे में स्नेह की मिठास
समझ गया वो
अब वक़्त आ गया है
कि अब वो भी बड़ा हो जाये 
माँ की ऊँगली छोड़
अब उसका हाथ थाम ले 
माँ की नज़र अब कमज़ोर हो रही है 
क्यूंकि माँ अब बूढी हो रही है

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