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Tuesday, April 26, 2011

मेरे पाँव

गीली ठण्ड को महसुस करते है
पानी को छुना पाँव भूले नहीं
उंगलियों में रेत छुपा के लाते है
लहरों से चोरी करना भूले नहीं
सम्हलने की कोशिश करते है
चट्टानों पे खड़ा होना भूले नहीं
कंकडो से साफ़ जगह देख लेते है
पत्थरो की पहचान भूले नहीं
भागने की होड़ में चल नहीं पाते
कदमो के निशान छोड़ना भूले नहीं
भूले नहीं थे कुछ भी मेरे पाँव
बस इन जूतों में बंधे रहते थे

Photo courtesy of Hari

3 comments:

varsha said...

पर बंधे रहना ही सब से बड़ी भूल बन जाए न -इसलिए वोह यादें ताज़ा कर लें - बहुत सुन्दर भाव !

main_sachchu_nadan said...

amazing ... I really liked the way it ended.

ओमी said...

Thanks Varsha and Sachin