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Sunday, April 08, 2012

संसद


जिनको चुनके भेजा था अब खुद ना चुन सके वो नेता 
लोकतंत्र में कोई भी पार्टी बेटा ही होगा सबका नेता 
वोटो की गिनती के बाद अपने वादों को भुला चुका 
घोषणाओं का वो पिटारा जीत के जश्न में जला चुका  
अब शुरू होना है उनके संघर्ष का एक नया किस्सा 
आशाएं है बहुत उनकी अब होगा उनका भी हिस्सा 
आम जनता को भूले दुर दराज़ के निकले रिश्ते नाते  
इनके उनके नामो से नित नए बैंको में खुल रहे खाते 
संसद से नदारद फ़िर भी मुद्दा बनाने न्यूज़ सेंटर आता 
समितियों से बना दिया है जैसे हर संसोधन का नाता
करने को बहस आते लेकिन अंत में फाड़ देते हैं परचा
हूटिंग करते मगर वोटिंग से पहले मांगे अपना खर्चा 
सबके अपने तरीके कुछ को वाक् आउट पसंद आता 
बाहर जाने का शौक है इतना फ़िर वो अंदर क्यूँ आता 
अब ना रहे वो लड़ने वाले अब नहीं रहीं वो लोकसभा
बिकते वोटो के बीच कहीं थोड़ी बिकती है राज्यसभा

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