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Sunday, March 25, 2007

ranbhoomi

देखो यह रणभूमि है

हर यहा मृत्यु शैया
जीत रात भर का आशीर्वाद है
सुबह लाती ललकार शत्रु की
साँझ सूचना घायलों की
मरने वालो कि पहचान कहा है
साबुत मिले वह शव कहा है
यहा लहू कि कहा कमी है
देखो यह रणभूमि है

गर्जन करते आगे बड़ते है
अपनी वीरता का दंभ भरते है
देखे महावीर जो कल लड़ते थे
आज खुले नयनो से सोये है
महत्वाकांक्षा के बलि हुए वह
बचे हुए फिर भी चलते है
जितने की ही सबको पड़ी है
देखो यह रणभूमि है

कुछ के पास अनुभव बहुत है
कुछ सीधे आँगन से आए है
मानव के सारे समंध भूल के
अपनी आंखों मे लहू लाये है
टपके पसीना शरीर से बाद मे
पहले इनका लहू बहता है
तलवार यहा अब किसकी सुखी है
देखो यह रणभूमि है

1 comment:

main_sachchu_nadan said...

Wah bhai .. kavitao pe kavitaye likhe ja rahe ho..gud one!!!