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Tuesday, March 01, 2011

वो कचरा बीनता है

टूटी बोतलों के ढक्कन में
फटे कपड़ो के साबुत जेबों में
छोटे मोटे लोहे के टुकडो में
वो ज़िन्दगी तलाशता है
वो कचरा बीनता है

कुछ आकार बना लेता है
जंग लगे तारो से
बेकार चीजों के ठेर में भी
वो खिलौना तलाशता है
वो कचरा बीनता है

लोगो की गालियों को कर
अनसुना अपने में खोया रहता है
दिखने में कम उमर का शायद
वो अपनी उमर तलाशता है
वो कचरा बीनता है

फेके गए टूटे हुए सामानों में
कुछ साबुत टुकड़े खोज ही लेता है
लोगो के इस्तेमाल हुई खुशियों में
अपनी भी ख़ुशी तलाशता है
वो कचरा बीनता है

2 comments:

Sagar said...
This comment has been removed by the author.
Sagar said...

I gauss it is the "Best" till among your all poems..