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Thursday, November 19, 2009

नया शहर

क्यों सुबह चलती नहीं कोई पुरवाई
क्यों सर्द होती नहीं यहाँ की शामे
क्यों कोई नहीं डरता तपती धुप से
क्यों कोई नहीं देखता रास्ता बारिश का
आये जो बिना बुलाये बौछारे
क्यों कोई यहाँ नहीं भीगता

क्यों बचपन यहाँ है इतना सोचता
क्यों कोई बच्चा पतंग नहीं लुटता
क्यों नहीं होती शादी गुडिया गुड्डो की
क्यों कोई रूठने के बाद खुद ही नहीं मानता
उम्र से जो सब लगते है सब छोटे यहाँ
क्यों बातो से वो बच्चा नहीं लगता

कोई नहीं जोड़ता पड्सियो से रिश्ता
कोई नहीं अब चीनी मागने आता
क्यों कोई नहीं है यहाँ दादी-दादा
क्यों हर दरवाजा बंद है रहता
इतनी भाषाए सबको आती है मगर
क्यों कोई बेवजह बाते नहीं करता

5 comments:

Nitin V said...

Is kavita ko Padhne ke baad yahi samajh aata hai ki hamara desh itna pyara kyon hai, haan bhale hi yaha burai bahut hai lekin acchai ki bhi kami nahi hai. Ye kavita paschim ka sach bayan karat hai..wah mere bhai wah..

main_sachchu_nadan said...

wah-wah .. majaaa aa gaya . This is literally a publishable creation.
OP Babu, aapke kavitao mein depth aati jaa rahi hai ab ... simply superb !!!

main_sachchu_nadan said...

wah-wah .. majaaa aa gaya . This is literally a publishable creation.
OP Babu, aapke kavitao mein depth aati jaa rahi hai ab ... simply superb !!!

maverick said...

OPji aapki bahut saari kavitaayein padi pur yeh kavita to sochne pe majboor karti hai....aaj ise pad kar samajh aaya ki yeh choti choti cheezein zindagi mein kya ehmiyat rakhti hain aur inki kami zindagi ko kitna neeras bana deti hai....keep up the gud work...

Sweta said...

Loved it :)

har koi jo aaj aapno se dur reh raha hai uske dil ka haal kehti hai ye kavita. :)