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Saturday, October 09, 2010

गौरिया

टेबल पर बिखरी किताबो से
जब मन उब जाता था
मेरे खिड़की पर कोई
एक संगीत युही सुनाता था

फुदक कर नन्हे कदमो से
वो जैसे दुरिया नापती थी
या नृत्य की कोई नयी विधा
जो मुझको सिखाना चाहती थी

कभी सूखे तिनके
अपनी चोंच में ले आती थी
जैसे अपने बन रहे
घर की बाते मुझे बताती थी
एक गौरिया कभी मेरी खिड़की पर आती थी

अब खिड़की के सामने
एक ईमारत ऊँची है
खोजा उसे बहुत पर
वो बस यादो में बची है

एक मित्र ने बताया
उसके घर अब भी आती है
मुझसे जैसे रूठ गयी पर
कुछ लोगो से अभी भी दोस्ती है

मेरी बस यही विनती है
बनाओ अपने घर चाहे जितने
यु उजाडो ना खोंसले उनके
कही किसी दिन दुनिया ना कहे
एक गौरिया कभी मेरी खिड़की पर आती थी

2 comments:

Sweta said...

very well written... you took me back to my childhood days when I used to see so many sparrows in our garden....

varsha said...

गौरिया को अब आशियाना नसीब नहीं -जंगले तो अब कंक्रीट के हैं.