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Saturday, November 14, 2009

एक सपना

पलकों की पीछे वाली गलियों मे
आँख मीचे एक सपना रहता है
बड़े बड़े सपनो के इस शहर मे
वो बच्चो सा सहमा रहता है


मेरे खोये बचपन की निशानी वो
मेरे वापस आने की राह तकता है
बंद कर घर के दरवाजो को
खिड़कियों से झाका करता है


झूटे मूटे वादों को सच्चा मान के
बाकी सपनो से लड़ा करता है
मेरे आने पे शिकायात करेगा
बाकी सपनो यह धमकी देता है


बचपन के साथियों को भूल गया हु
मेरे बड़े होने कि कीमत यही है
इसका भी पता किसी कागज़ मे लिख के
उस कागज़ का पता भूल गया हु

मेरे भी दिल कि किसी कोने मे
मुठी बंधे एक उम्मीद रहती है
हर बड़े सपने के पुरे होने के बाद
इसके पुरे होने कि दुआ मांगती है

2 comments:

main_sachchu_nadan said...

Wah OP babu .. kafi maasoom si bhavnao ka badi sahaj bhasha mein bakhaan kiya hia. Majaa aa gaya padh ke ...

Nitin V said...

Ye sach hamesha kadwa kyo hota hai, kabhi isme mithaas kyo nahi hoti..ho sakta hai hamara najaria hamesha kadwahat ko hi dhundta hai..shayad samaj ne aaj mithaas ko bhula diya hai ya hum unhe yaad nahi karna chahta..khair jo bhi ho sach to kadwa hi hota hai..lekin purani beetein hui baatein hamesha sach hone ke bawjood ek mithaas ka ehsaas dilati hain, shayad yahi jindagi hai...